नई सोचवालो के भावनाओ की इस स्वतंत्र अभिव्यक्ति के उत्तम जरिया ब्लॉग पर बहुत-बहुत स्वागत है.क्योकि मेरा ऐसा मानना है कि समाज में फैले सारे मुद्दे को सही करना मुमकिन नहीं हो पाता है, तो ऐसे में कम से कम हम नई सोच रखनेवाले आपस में चर्चा कर कुछ तो सुधार के मार्ग में एक छोटी सी पहल तो कर ही सकते है
बुधवार, 22 दिसंबर 2010
आखिर ये कैसा बदलाव...........
पढ़ते-पढ़ते कब हम इतने बड़े हो गये पता भी नहीं चला एहसास तो तब हुआ हम हमारे साथ पढनेवाली एक सहेली शादी के पवित्र बंधन में जल्द ही बंधने जा रही है बस कुछ दिनों की बात है, जब वो हमेशा-हमेशा के लिए पराई होकर किसी और के आँगन को गुलज़ार करेगी,तब उसके सोच का दायरा पति,ससुराल तक सीमित हो जायेगा,तब हम वो हक़ नही जता पाएंगे जो आज जताते है, ककुकी तब वो जिम्मिदारियो के बंधन में बंध जाएगी,तब वो किसी की दुनिया बसाने की जिम्मिदारियो से लदी, होगी जहा वो चाहकर भी अपने मायके और सहेलिओ को पहले वाला प्यार ना दे पाए.मै आज तक ये नही समझ पाई की आखिर क्यू सिर्फ शादी के बाद एक लड़की की दुनिया पूरी तरह से बदल जाती है, जहा बदलाव सिर्फ लडकियो की जिंदगी में आते है, कैसे आज के आधुनिकता के परिवेश में पली बढ़ी लड़की, आधुनिकता के सारे दायरे को छोड़कर पारम्परिकता के बेडी में बंधने को विवश हो जाती है,हां ये सच है की उसकी खुद की ऐसे करने की कोई इक्षा ना होते हुए भी कुछ सामाजिक बंधन ,तो कुछ माँ-बाप की लाचारी जो उसे ऐसे करने के लिए मजबूर कर देते है, जहा उसे खुद की सोच,नज़रिए को परे रखकर सब को देखते हुए हर फैसला करना पड़ता है, जहा उसे स्वयं को किनारे रखते हुए सोचना पड़ता है.आज भी हमारा समाज इन मामलो में वही पुरानी सोच रखता है जो आज से २०-३० साल पहले था, मुझे तो ऐसा लगता है कि हमारी मम्मी के ज़माने का पुनर्प्रसारण हो रहा है, जैसे आजकल पुरानी फिल्मो के रिमेक बनाकर होता है, बस लिबास और चेहरे बदल गए है, बाकी सारी चीज़े वही है, आखिर कब तक सिर्फ लडकियों की जिंदगी का फैसला ये दकियानूसी सामाजिक परम्परा करते रहेंगे, जहा उनकी खुद की इक्षा का कोई मतलब नही है........
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ye purush pradhan desh hai..
जवाब देंहटाएंyahan unhi ki banayi paramparayein virajmaan hain..
chahkar bhi hum unhe badal nahi paa rahe hai
accha varnan kiya hai..
keep it up...
"आखिर कब तक सिर्फ लडकियों की जिंदगी का फैसला ये दकियानूसी सामाजिक परम्परा करते रहेंगे, जहा उनकी खुद की इक्षा का कोई मतलब नही है........"
जवाब देंहटाएंसार्थक सोच जिसकी सख्त जरुरत है
आपको पढकर बहुत अच्छा लगा .. इस नए चिट्ठे के साथ हिंदी ब्लॉग जगत में आपका सवागत है .. नियमित लेखन के लिए शुभकामनाएं !!
जवाब देंहटाएंशानदार पेशकश।
जवाब देंहटाएंडॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
सम्पादक-प्रेसपालिका (जयपुर से प्रकाशित हिंदी पाक्षिक)एवं
राष्ट्रीय अध्यक्ष-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास)
0141-2222225 (सायं 7 सम 8 बजे)
098285-02666
कहीं आपकी सोच का ये अर्थ तो नहीं कि लडकियों को शादी ही नहीं करनी चाहिये ?
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